रविवार, 17 जून 2012

अजायबघर


बढ गया
बिजली का बिल
स्ट्रीट लाईट नहीं जलती
इन्वरटर की बैटरी
लग गयी है कार में
हेडलाईट नहीं जलती
सर को पटकने से
जलती है एल ई डी लाईट
देती है मद्धम रोशनी
पॉंडस का पावडर लगाने से भी
नहीं बढती चमक 
पैरों में आलता लगाते ही
निकल आते हैं सांप बिल से
रात गहराते ही
बड़- बड़े मेंढको से भर गया
घर का आंगन
बाऊंड्री वाल पर बैठा गिरगिट
बुलाता है मुझे सिर हिला  कर
शरम नहीं आती
क्या माँ बहन नही
बिजली ने सितम ढाया
मेरा घर देखो
अजायबघर हो गया है

5 टिप्‍पणियां:

  1. गहन अभिव्यकति, आपकी कविता समझने के लिए मुझे फ़्रायड को फ़िर एक बार पढना पड़ेगा। बढिया लिखती हैं आप, शुभकामनाएं

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!

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  3. ऐसा लग रहा है जैसे बारिश की रात का चित्र खींचा गया है जब बिजली गुल हो जाती है औरजीव -जंतु विचरण करने लगते हैं, घर के भीतर बिना डर के, उलटे आपको डरते हुए... बचिए इनसे.... गहन अभिव्यक्ति...शुभकामनायें

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  4. वाह............
    सुन्दर ख्याल...अभिव्यक्ति कुछ हट के...
    बहुत खूब.

    अनु

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