शनिवार, 7 अप्रैल 2012

सिर्फ़ तुम ही तुम

कुछ याद नहीं
जब सपने मे तुम आए
चूडियां खनकी
उफ़्फ़! चुंबन से तुम्हारे
बिजली सी कौंधी
पायल कंपकंपाने लगी
उड़ गए कपोत
मेरे हाथों के
सुध न रही
मुझे अपनी ही
जब तुम गिन रहे थे
एक एक चूडियां
हरी लाल नीली
सुनहली सपनीली
सांसो की सरगम
पहुचना चाहती थी
मंजिल पर
सहसा ठहर गया वक्त
घूमती रही धरा
शुन्याकार हुआ
हुआ वुजूद
थरथराते रहे लब
मुंद ली आंखे मैने
सपने में ही
छा गए हर तरफ़
सिर्फ़ तुम ही तुम

1 टिप्पणी:

  1. कोमल भावों से सजी ..
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं...वाकई.... आशा हैं आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....!!

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