बुधवार, 23 मई 2012

जुग जुग जीयो बेटियों


स्कूल जाते हुए
हम जब बनती संवरती
दादी देख-देख गुस्साती
ये रांडे बन संवर के
किधर जाएगीं?
सारा दिन शीशे के सामने
खड़ी रहती है लौंडों सी
हम दादी से बहुत डरते
उसे सामने खाट पर बैठे देखकर
पीछे से निकल जाते
सारे घर में उसका दबदबा कायम था
दादी की ही चलती थी
हम उसकी बहुत परवाह करते
आज दादी वहीं खाट पर बैठे रहती है
कोई नहीं पूछता
न बहु, न पोते
सभी सामने से निकल जाते हैं
दादी झल्ला कर उनसे कहती
मेरी पोतियां ही अच्छी थी
जो मेरा कहना मानती थी
ये निकरमे किसी काम के नहीं
इनका बस चले तो रोटी के
टुकड़े के लिए तरसा दें
जुग जुग जीयो बेटियों

9 टिप्‍पणियां:

  1. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

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  2. बेटियाँ ही बुजूर्गों का ख्याल रखती है। ये सही कहा दादी ने। दादी का डॉटना अब अच्छा लगता होगा।

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  3. बेटियां तो भली ही होती है !
    दादी का खट्टा -मीठा रिश्ता अलग ही होता है !

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  4. बहुत सुन्दर सच्चाई से लिपटे हुए शब्द ...सार्थक पोस्ट दादी ने सही कहा लडकियां बुजुर्गों की भावनाओं को बेहतर समझती हैं

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  5. वाह इन शब्दो में वाकई मिटटी की महक है

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  6. saty ko uker diya apki rachna ne...lekin fir bhi betiyon ki dasha ant tak is budhi dadi ki tarah hi rahti hai.

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